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2017 चैत्र नवरात्री क्यों है ख़ास

 

नवरात्री में विशेषतः माँ दुर्गा के नौ रूपो की उपासना की जाती है। चैत्र नवरात्री का पुराणों में बड़ा ही महत्व है। आइये सबसे पहले जानते है की चैत्र नवरात्री २०१७ का शुभारम्भ कब से है:-
२९-०३-२०१७ : कलश स्थापना एवं माँ शैलपुत्री पूजा
३०-०३-२०१७ : चंद्र दर्शन, सिंधारा दूज एवं माँ ब्रह्मचारिणी पूजा
३१-०३-२०१७ : गौरी तीज, सौभाग्य तीज, माँ चंद्र घंटा पूजा, विनायक चतुर्थी
०१-०४-२०१७ : माँ कुष्मांडा पूजा, नाग पूजा, लक्ष्मी पंचमी
०२-०४-२०१७ : माँ स्कन्दमाता पूजा,स्कन्द षष्ठ ठी, यमुना छठ, कात्यानी पूजा
०३-०४-२०१७ : महा सप्तमी पूजा, काल रात्रि पूजा
०४-०४-२०१७ : दुर्गा अष्टमी, महागौरी पूजा, अन्नपूर्णा अष्टमी, संधि पूजा
०५-०४-२०१७ : राम नवमी पूजा
०६-०४-२०१७ : नवरात्री पारण
चैत्र नवरात्रि, शरद नवरात्रि के समान, नौ दिनों के लिये आयोजित की जाती है। चैत्र नवरात्रि माँ दुर्गा को समर्पित होती है। माता के भक्त प्रतिपदा से नवमी तक माता के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना और उपवास कर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
चैत्र नवरात्रि के लिये घटस्थापना चैत्र प्रतिपदा को होती है जो कि हिन्दु कैलेण्डर का पहला दिवस होता है। अतः भक्त लोग साल के प्रथम दिन से अगले नौ दिनों तक माता की पूजा कर वर्ष का शुभारम्भ करते हैं। चैत्र नवरात्रि को वसन्त नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। भगवान राम का जन्मदिवस चैत्र नवरात्रि के अन्तिम दिन पड़ता है और इस कारण से चैत्र नवरात्रि को राम नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है।

चैत्र नवरात्रि के दिन माता दुर्गा के नौ भिन्न-भिन्न स्वरूपों को समर्पित होते हैं। शरद नवरात्रि में किये जाने वाले सभी अनुष्ठान चैत्र नवरात्रि के दौरान भी किये जाते हैं। शरद नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि की घटस्थापना पूजा विधि समान ही होती है।
चैत्र नवरात्रि उत्तरी भारतीय प्रदेशों में ज्यादा प्रचलित है। महाराष्ट्र में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत गुड़ी पड़वा से और आन्ध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में उगादी से होती है।

चैत्र नवरात्र काल इस कारण और भी विशिष्ट है, क्योंकि इसके साथ हमारे भारतीय नववर्ष नवसंवत्सर का भी शुभारंभ होता है। हिंदू धर्म में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को स्वयंसिद्ध अमृत तिथि माना गया है। वर्ष भर का सबसे उत्तम दिन। सृष्टि रचयिता ब्रह्मा ने धरती पर जीवों की रचना के लिए इसी शुभ दिन का चयन किया और समूचे जीव जगत की रचना की तथा लोकपालक श्रीहरि विष्णु ने सृष्टि के प्रथम जीव के रूप में इसी दिन प्रथम मत्स्यावतार लिया था। त्रेता युग में लंका विजय के बाद अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का राज्याभिषेक इसी शुभ दिन हुआ था। द्वापर काल में महाभारत के युद्ध में विजय के उपरांत धर्मराज युधिष्ठिर भी इसी दिन राजगद्दी पर बैठे थे। इसी विशेष तिथि को सिंधी समाज के महान संत झूलेलाल का जन्म हुआ था, जो वरुण देव के अवतार माने जाते हैं। सिख परंपरा के द्वितीय गुरु अंगद देव का जन्म भी इसी पावन दिन हुआ था। समाज से आडंबरों का विनाश करने के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना के लिए चैत्र प्रतिपदा की तिथि निर्धारित की। यही नहीं, देश में विक्रमी व शक संवत का शुभारंभ भी चैत्र प्रतिपदा की तिथि को ही हुआ।

देश के सनातनधर्मी हिंदू परिवार अपने सांस्कृतिक पर्व-उत्सवों, जन्म-मुंडन, विवाह संस्कार व श्राद्ध-तर्पण आदि विक्रमी संवत के उसी भारतीय पांचांग के अनुसार करते हैं, जिसकी रचना महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने चैत्र प्रतिपदा के दिन की थी। इस कालगणना के आधार पर दिन-रात, सप्ताह, पखवारा, महीने, साल और ऋ तुओं का निर्धारण किया और 12 महीनों और छह ऋ तुओं के पूरे एक चक्र यानी पूरे वर्ष की अवधि को संवत्सर का नाम दिया। खास बात यह है कि यह कालगणना युगों बाद भी पूरी तरह सटीक साबित हो रही है। इसे सुखद संयोग कहें या वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले हमारे ऋ षियों का दूरदर्शी चिंतन कि उन्होंने चैत्र मास के इस संधिकाल को मां शक्ति की आराधना से जोड़कर देवत्वपूर्ण बना दिया। साधना की इस अमृत बेला में शक्ति की देवी मां दुर्गा की उपासना का विधान है।

मार्कण्डेय पुराण के अंश दुर्गासप्तशती में मां दुर्गा का माहात्म्य विस्तार से वर्णित है। इस कथा का शिक्षाप्रद दर्शन सार्वकालिक और सर्वोपयोगी है। दुर्गा का शाब्दिक अर्थ है दुर्ग यानी किला। उनके दुर्ग की छत्रछाया सारे दुख, दुर्गुण और पीड़ा दूर कर देती है। मगर मां दुर्गा के दुर्ग में प्रवेश कर पाना सबके लिए संभव नहीं है। उसमें निष्कपट व निश्छल मनुष्य को ही प्रवेश मिल सकता है। मां दुर्गा दुर्गतिनाशिनी कही जाती हैं। उन्होंने अनेक असुरों को मारकर प्रतीकात्मक रूप से यह संदेश दिया कि महिषासुर, धूम्र लोचन, चंड- मुंड, शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ आदि असुर हमारे भीतर स्थित आलस, लालच और घमंड जैसी दुष्प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं, जो हमें पतन की ओर ले जाने का प्रयास करते हैं।
वस्तुत: प्रत्येक व्यक्ति के अंतस में दो प्रकार की वृत्तियां होती हैं- दैवी और आसुरी। हमारी बुरी आदतें आसुरी वृत्ति हैं, जबकि अच्छाइयां दैवी वृत्ति। इसी कारण दुर्गा सप्तशती में मां दुर्गा से प्रार्थना की गई है कि हे मां! अपनी कृपादृष्टि से मेरे भीतर की कुवृत्तियों को समाप्त करो। यह अज्ञानमय काला अंधकार मेरे निकट आ चुका है। मेरे भीतर सद्ज्ञान की ज्योति जलाकर इसे मिटाओ। इस तरह मां दुर्गा का चरित्र तमाम दैवीय शिक्षा-प्रसंगों से भरा पड़ा है। बस जरूरत है, इसे समझने की। जो इसे हृदयंगम कर लेगा, वह जीवन में कभी अवनति को प्राप्त नहीं होगा। आइए, एक शुभ संकल्प के साथ इस नवरात्र पर अपने भीतर साधना की दिव्य ज्योति जलाकर अपने भीतर बैठे असुरों का विनाश करें।

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